देखता रहता हूँ उफक पे उगते-डूबते लम्हों का मंजर,
पथरा गया तो अब मुजे में जाग उठा हे एहसासे समंदर,,
तेरी याद से स्याह कितनी, तन्हा रात थी,
किससे करे गीला कोई किस्मत की बात थी,,
इश्क को एक अरसे तक "तौफीक" समजता रहा,,
अब समज में आया सारी वक्त की सौगात थी,
जिन्दगी यूँ ही बढ़ती जा रही थी कदम-दर-कदम,
अब सोचता हूँ एक मोड़ पर कब दिन था, कब रात थी,,
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