मिल भी जाते हे तो कतरा के निकाल जाते हे,
हाये मौसम की तरहा दोस्त बदल जाते हे,,,,,,
हम अभी तक हे गीरफ्तारे मुहोब्बत यारों,,,
थोकरे खाके सुना था के सम्हल जाते हे,,,,,,,
वो कभी अपनी जफा पर ना हुआ शर्मिंदा,
हम समजते रहे पत्थर भी पिघल जाते हे,,,,,,,
उम्र भर जिनकी वफ़ा ओ पे भरोसा कीजे,,
वक्त पड़ने पे वो ही लोग बदल जाते हे,,,,,,,,
इस तगाफुल पे ये आलम के हर-एक महफिल से,
वो भी गाते हुए ग़ालिब की ग़ज़ल जाते हे,,,,,
No comments:
Post a Comment