Wednesday, 31 October 2012

क्या तुज पे, नज्म लिखूँ, ओर कैसा गीत लिख्खु,
जब तेरी तारीफ करूँ, सुर-ताल में "मीत" लिखु,
कलावती में तेरी छबी हे, मुखड़ा रूप का दर्पण, 
तेरे लबों के रंग में पाये मेने,लाले अमल,
हवा में उड़ती लत का सुहावती ,बढ़ती जय-जय वंती,
महेका-महेका खिला-खिला सा तेरा रंग बसन्ती,
बाल कमर पे जैसे पहाड़ी पर घन-घोर घटा ये, 
ये वृष नैना सावन-भादो, प्रेम का रस बरसाये,
तेरी सोहनी-मोहनी सूरत कोमल कंचन काया, 
जाने ग़ज़ल किस् मै से पाई तेरे हुश्न की छाया, 
जिसमें  सुखन  रागेश्वरी  हूरें संगीत लिखूँ,
तेरी धानी चुनरिया लेहरे, जैसे मधुर मयार,,
प्यार का गुलसन  महेका-महेका, तुजसे जाने बहार,
तेरी एक जलक हे काफी, मुजको जान से प्यारी,
चाल नशीली देखके तेरी, रस करे दरबारी,
सर से पाव तलक दिल कश अंदाज़ तेरा सहाना,
तू मेरी गुल-कली हे जाना,में तेरा दीवाना,
तेरी चाहत दिल में लेकर घूमा देश-विदेश,
तुजसे जब भी दूर् रहा हूँ, थारा चुम लिया देश,
सदा सुहागन भैरवी तुजको प्रीत की रीत लिखु

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