Tuesday, 4 September 2012


ये जिंदगी, ,,ये जिंदगी,,
ये जिंदगी आज जो तुम्हारे,
बदन की छोटी बड़ी नशों में मचल रही हे,
तुम्हारे पैरों से चल रही हे,
ये जिंदगी,,,ये जिंदगी,,,,,
तुम्हारी आवाज़ में गले से निकल रही हे,
तुम्हारे  लफ्जौ में ढल रही हे,,,,,,
ये जिंदगी,,,ये जिंदगी,,,
ये जिंदगी जाने कितनी सदियों से शक्लें बदल रही हे,,,
बदलती शक्लो, बदलते जिस्मो में,
चलता फिरता ये एक शरारा,,,,,
जो इस घड़ी नाम हे तुम्हारा,,,,
इसी से सारी चहल-पहल हे,
इसी से रोशन हर नजारा,,,
सितारे तोडों या घर बसा ओ,
अलम उठा ओ, या सर जुका ओ,
तुम्हारी आँखों की रोशनि तक हे खेल सारा,,,,,,
ये खेल होगा नही दुबारा,,,,,

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