मुझ से पहले तुझे जिस शख्स ने चाहा होगा
शायद अब भी तेरा ग़म दिल से लगा रखा हो
एक बेनाम- सी उमीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रखा हो
मैंने माना कि वो बेगाना-ए-पैमाना-वफ़ा
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तेरी महफ़िल में
और कोई दुःख न रुलाए तुझे तन्हाई में
मैंने माना कि शबो- रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता-रफ़्ता
चाहे उमीद की शमए हों कि यादों के चिराग़
मुस्तक़िल बोअद बुझा देता है रफ़्ता-रफ़्ता
फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख्म भर जाएं मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
ये भी मुमकिन है कि एक दिन वो पशेमाँ होकर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू की मासूम भी है, ज़ूद -फ़रामोश भी है
उसकी पैमाँ- शिकनी को भी गवारा कर ले
और मैं, जिसने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख्म और भी पहले की तरह सह जाऊं
जिस पे पहले भी कई अहदे-वफ़ा टूटे हैं
इसी दोराहे पे चुपचाप खड़ा रह जाऊं
______________________फ़राज़
शायद अब भी तेरा ग़म दिल से लगा रखा हो
एक बेनाम- सी उमीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रखा हो
मैंने माना कि वो बेगाना-ए-पैमाना-वफ़ा
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तेरी महफ़िल में
और कोई दुःख न रुलाए तुझे तन्हाई में
मैंने माना कि शबो- रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता-रफ़्ता
चाहे उमीद की शमए हों कि यादों के चिराग़
मुस्तक़िल बोअद बुझा देता है रफ़्ता-रफ़्ता
फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख्म भर जाएं मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
ये भी मुमकिन है कि एक दिन वो पशेमाँ होकर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू की मासूम भी है, ज़ूद -फ़रामोश भी है
उसकी पैमाँ- शिकनी को भी गवारा कर ले
और मैं, जिसने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख्म और भी पहले की तरह सह जाऊं
जिस पे पहले भी कई अहदे-वफ़ा टूटे हैं
इसी दोराहे पे चुपचाप खड़ा रह जाऊं
______________________फ़राज़
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