mukesh875
Saturday, 7 July 2012
धरा के तन से धूल बहा ले गई,
पेहली बारिश की बूँदें, जैसे कानोमे कुछ कैह् गई,
हलका -हलका मन में सुरुर उठ रहा हे,
बदन में एक अजब सी सिहरन दौड़ गई,
शुष्क धरती के होठ, प्यासे हो जैसे सदियों से,
बूँद-बूँद अमृत बन उसे तर कर गई,
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