Monday, 19 March 2012

वसीयत

वसीयत

ज़िन्दगी का भी कोई भरोसा है क्या ? कौन से चौराहे पर goodbye कह दे ! कल जो हंस रहा था, आज शमशान में फुंक रहा है !जिस दिन मौत दरवाज़े आ गयी तो तुमसे इतना कहने का भी मौक़ा न देगी कि मेरे बाद अपना ख़याल रखना ! बस, जिंदगी के ऐसे ही आवारा मिजाज़ (मेरे जैसे ) देखते हुए मैंने पहले ही अपनी वसीयत  लिख डाली थी. आज इसे रीपोस्ट किया जा रहा है . सब के नाम कुछ न कुछ है ..ले जाओ जिसको जो ले जाना है...........!


अपने पूरे होशो - हवास में ,
लिख रही हूँ आज मैं ;
वसीयत अपनी !

मेरे मरने के बाद
खंगालना मेरा कमरा
टटोलना हर एक चीज़
घर भर में बिन ताले के
मेरा सामान बिखरा पड़ा है

दे देना मेरे ख़्वाब,
उन तमाम स्त्रियों को ;
जो किचन से बेडरूम
तक सिमट गयी अपनी दुनिया में
गुम गयी हैं -
वे भूल चुकी हैं सालों पहले
ख़्वाब देखना !

बाँट देना मेरे ठहाके -
वृद्धाश्रम के उन बूढों में
जिनके बच्चे -
अमेरिका के जगमगाते शहरों में
लापता हो गए हैं

टेबल पर मेरे देखना -
कुछ रंग पड़े होंगे ;
इस रंग से रंग देना
उस बेवा की साडी
जिसके आदमी के खून से
बॉर्डर रंगा हुआ है
तिरंगे में लिपट कर
वो कल शाम सो गया है

शोखी मेरी - मस्ती मेरी ;
भर देना उनकी रग - रग में -
झुके हुए हैं कंधे जिनके,
बस्तों के भारी बोझ से !

आंसू मेरे दे देना,
तमाम शायरों को -
हर बूँद से ,
होगी ग़ज़ल पैदा
मेरा वादा है !

मेरी गहरी नींद और भूख
दे देना 'अंबानियों' को
'मित्तलों' को -
न चैन से सो पाते हैं बेचारे ;
न चैन से खा पाते हैं !

मेरा मान , मेरी आबरू ;
उस वेश्या के नाम है -
बेचती है जिस्म जो ;
बेटी को पढ़ाने के लिए !

इस देश के
एक-एक युवक को
पकड़ के -
लगा देना 'इंजेक्शन'
मेरे आक्रोश का-
पड़ेगी इसकी ज़रुरत,
क्रान्ति के दिन उन्हें !

दीवानगी मेरी
हिस्से में है
उस सूफ़ी के
निकला है जो -
सब छोड़ कर ,
ख़ुदा की तलाश में !

बस !

बाक़ी बचे -
मेरी ईर्ष्या,
मेरा लालच ,
मेरा क्रोध ,
मेरे झूठ ,
मेरा स्वार्थ -
तो -
ऐसा करना
उन्हें मेरे संग ही जला देना !

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