कुछ पन्ने..
बुझ जाएगा सूरज कुछ हज़ार सालों में; पर जलती रहूंगी मैं..
Sunday, March 18, 2012
जूते
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| विन्सेंट वान गॉग की कृति |
घिसे तल्ले वाले जूते
तुम तक पहुँचने की अनिवार्य शर्त थे
और मैं दिन रात पैदल चलती रही
कठोरता की प्रतियोगिता में
वह मोची निरीह दिखता है
जिसने किसी पशु का चमड़ा काट कर
मेरे जूते सिले हैं
जीतना तुम्हारी आदत है
एक बार तुम्हें मेरा चस्का चढ़ा था
अब तुम्हारी छाती पर टंगा हुआ जीत का तमगा हूँ
चस्के पुराने हो कर आदत में ढल जाते हैं
फाह्यान की आत्मा उसके पैरों में रहती थी
चलना उसका धर्म था
उसके जूतों पर जमी धूल की परतें
आस्था में डूबे श्लोक हैं
तुम्हारे पैर के अंगूठे के ठीक नीचे
मेरे प्राण बसते हैं
चलना मेरी विवशता है
मेरे जूतों के फटे तल्ले
मेरी जिजीविषा का प्रमाण हैं
गोलाइयों के भी कोने होते हैं
दुनिया के हर कोने में
रक्त के कुछ धब्बे हैं
जूतों के फटे मुंह बोलने लगे हैं -
पृथ्वी चौकोर है
एक बार उस द्वीप तक तुम
पैदल जाना चाहते थे
मैंने अपनी देह से चमड़ा निकाल कर
तुम्हारे जूते सिल दिए
गुणवत्ता की प्रतियोगिता में भी
वो मोची हार जाएगा
मुझे लकड़ियों के ऊपर औंधे मुंह रखना
मेरी पीठ पर त्वचा नहीं है
जूतों के फटे मुंह बोलने लगे हैं
तुम दो महाद्वीपों में बंटा हुआ इस्ताम्बुल शहर हो !
Sunday, February 26, 2012
माइग्रेन, ट्राइका और एक निहायत ही दो कौड़ी की बात
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| मीत के कैमरे से .. |
मैं कहती हूँ किसी इश्तेहार का क्या अर्थ बाक़ी है
कि जब हर कोई चेसबोर्ड पर ही रेंग रहा है
आड़ी- टेढ़ी या ढाई घर चालें तो वक़्त तय कर चुका है
काले सफ़ेद खाने मौसम के हिसाब से
आपस में जगह बदलते हैं
फिर क्यों झूठे सत्य की तलाश में भटका जाए
एक नट सदियों से रस्सी पर चल रहा है
न उसने संतुलन का भ्रम दिखाया
न हवा में शरीर फ़ेंक कलाबाजी का नमूना पेश किया
उलटे सिक्के फेंकने वाले तमाशबीनो की ओर उछाल दिया
फोंटाना द त्रेवी का रूट मैप
पानी का देवता सिक्कों की माला पहन तुम्हे दुबारा बुलाता है
हर दुःख दरकिनार कर तुम चल पड़ते हो
अपनी ही परछाईं देखने
जबकि कहीं का भी पानी तुम्हें अपनी ही शक्ल दिखाता है
पर कामना से भरे हुए तुम
रोम के पानी में ख़ुद को बेहतर पाते हो
झूठ है तो दुनिया क़ायम है
सत्य कोयले की खदान में लगी आग है
याद है..
एक बार पृथ्वी आग का गोला थी ?
मेरे मकान की ईंटें कब की पक चुकी हैं
गर्म फ़र्श पर नंगे पाँव चलना अब मुश्किल है
मेरे कमरे में अब आग की लपटों की दीवारें होंगी
राख के ढेर पर बैठे हुए मैं
भटकी हुयी 'एलिस' को राह बता दूंगी
मोड़ का आख़िरी घर उसका है
जबकि पहला घर और बीच के सारे घर भी उसके ही हैं
पूरी दुनिया को नींद में चलने की बीमारी है
उस डॉक्टर को भी जो नींद में पर्ची पे पर्ची लिखे जा रहा है !
Friday, February 24, 2012
मुजरा, मृत्यु , ईश्वर और मैं यानी बाबुषा
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| सुशोभित की उम्दा क्लिक |
(एक )
'बिग बैंग' सिद्धांत से ग्रह जन्मे होंगे. संसार उस अदृश्य उंगली के चारों ओर घूमता 'सुदर्शन' है.
( दो )
(तीन )
अपनी लाल किताब में जीवन लिखते हुए ईश्वर ने पेड़, पहाड़, चाँद -सितारे, चिड़िया, नदिया, झरने ,समन्दर, सब लिख डाला.
.................. और फिर पहली बार मृत्यु शब्द लिखते ही उसने ने अपनी कलम की नोक तोड़ दी !
Thursday, January 5, 2012
शीतयुद्ध
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| जर्मन फोटोग्राफर नताली बोटर की क्लिक |
तुम पेंसिल से लिखते हो
इरेज़र से मिटा देते हो
काग़ज़ फिर सादा हो जाता है
ग़ौर से देखो
सादे काग़ज़ पर भी पेंसिल के दबाव से बने निशान
मेरी हथेलियों की उलझी हुई रेखाओं का मानचित्र हैं
एक-सी है एक बात तुममें और ईश्वर में
तुम दोनों का गिरेबान मैंने पकड़ रखा है
*
स्मृतियों की शॉल ओढ़ कर
बचा ली है मैंने पतली नसों में गर्मास
मैं जीवित हूँ
कि तुमने गोली नहीं चलाई है
तुम जीवित हो
कि मैंने नज़र नहीं उठायी है

Saturday, December 31, 2011
सूर्य, पृथ्वी और दो हज़ार ग्यारह गांठें
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| पसंदीदा पेंटिंग ( पेंटर नामालूम ) |
सफ़ेद दाढ़ी वाले तारे
एक जोगन के प्रेम का साक्षी बन
सदियों से जाग रहे हैं
अंतरिक्ष के मंडप में
मन्त्रों का अनुस्वान है
वह स्त्री
पीले चीवर वाले ऋषि के
आलोक से बौरा गयी है
गिन के देखो तो -
उसकी चुनरी के छोर में
दो हज़ार ग्यारह गांठें बंधी हैं
ध्यान में डूबे हुए प्रेमी के
उखम और तेज से गर्भ धारण कर
जनती है / मां बनती है
ऋतु / भोर और जुन्हैया
उसकी गोद में खेलती संतानें हैं
जिसके ललाट पर चमकती सलवटें हैं
वह ऋषि आकाश में धूनी रमाये बैठा है
उसकी अमित आभा से सम्मोहित
प्रेयसी का सूफी नृत्य अनवरत चलता है !
(2011 को विदा करते हुए.)
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