Monday, 19 March 2012


Sunday, March 18, 2012

जूते

विन्सेंट वान गॉग की कृति
घिसे तल्ले वाले जूते
तुम तक  पहुँचने की अनिवार्य शर्त थे
और मैं दिन रात पैदल चलती रही

कठोरता की प्रतियोगिता में
वह मोची निरीह दिखता है
जिसने किसी पशु का चमड़ा काट कर
मेरे जूते सिले हैं

जीतना तुम्हारी आदत है

एक बार तुम्हें मेरा चस्का चढ़ा था
अब तुम्हारी छाती पर टंगा हुआ जीत का तमगा हूँ
चस्के पुराने हो कर आदत में ढल जाते हैं

फाह्यान की आत्मा उसके पैरों में रहती थी
चलना उसका धर्म था
उसके जूतों पर जमी धूल की परतें
आस्था में डूबे श्लोक हैं

तुम्हारे पैर के अंगूठे के ठीक नीचे
मेरे प्राण बसते हैं
चलना मेरी विवशता है
मेरे जूतों के फटे तल्ले
मेरी जिजीविषा का प्रमाण हैं

गोलाइयों के भी कोने होते हैं
दुनिया के हर कोने में
रक्त के कुछ धब्बे हैं

जूतों के फटे मुंह बोलने लगे हैं -
पृथ्वी चौकोर है

एक बार उस द्वीप तक तुम
पैदल जाना चाहते थे 
मैंने अपनी देह से चमड़ा निकाल कर
तुम्हारे जूते सिल दिए
गुणवत्ता की प्रतियोगिता में भी
वो मोची हार जाएगा

मुझे लकड़ियों के ऊपर औंधे मुंह रखना
मेरी पीठ पर त्वचा नहीं है

जूतों के फटे मुंह बोलने लगे हैं
तुम दो महाद्वीपों में बंटा हुआ इस्ताम्बुल शहर हो !

Sunday, February 26, 2012

माइग्रेन, ट्राइका और एक निहायत ही दो कौड़ी की बात

मीत  के कैमरे से ..

मैं कहती हूँ किसी इश्तेहार का क्या अर्थ बाक़ी है
कि जब हर कोई चेसबोर्ड पर ही रेंग रहा है
आड़ी- टेढ़ी या ढाई घर चालें तो वक़्त  तय कर चुका है
काले सफ़ेद खाने मौसम के हिसाब से
आपस में जगह बदलते हैं

फिर क्यों झूठे सत्य की तलाश में भटका जाए

एक नट सदियों से रस्सी पर चल रहा है
न उसने संतुलन का भ्रम दिखाया
न हवा में शरीर फ़ेंक कलाबाजी का नमूना पेश किया
उलटे सिक्के फेंकने वाले तमाशबीनो की ओर उछाल दिया
फोंटाना द त्रेवी का रूट मैप

पानी का देवता सिक्कों की माला पहन तुम्हे दुबारा बुलाता है
हर दुःख दरकिनार कर तुम चल पड़ते हो
अपनी ही परछाईं देखने
जबकि कहीं का भी पानी तुम्हें अपनी ही शक्ल दिखाता है
पर कामना से भरे हुए तुम
रोम के पानी में ख़ुद को बेहतर पाते हो

झूठ है तो दुनिया क़ायम है
सत्य कोयले की खदान में लगी आग है
याद है..
एक बार पृथ्वी आग का गोला थी ?

मेरे मकान की ईंटें कब की पक चुकी हैं
गर्म फ़र्श पर नंगे पाँव चलना अब मुश्किल है
मेरे कमरे में अब आग की लपटों की दीवारें होंगी
राख के ढेर पर बैठे हुए मैं
भटकी हुयी 'एलिस' को राह बता दूंगी
मोड़ का आख़िरी घर उसका है
जबकि पहला घर और बीच के सारे घर भी उसके ही हैं

पूरी दुनिया को नींद में चलने की बीमारी है
उस डॉक्टर  को भी जो नींद में पर्ची पे पर्ची लिखे जा रहा है   !


  

Friday, February 24, 2012

मुजरा, मृत्यु , ईश्वर और मैं यानी बाबुषा

सुशोभित की  उम्दा क्लिक 
(एक  ) 

मेरे हृदय में एक अदृश्य कोशिका है, जो धागे की गिटी की तरह पृथ्वी को लपेटे हुए है. मेरे मस्तिष्क में एक अदृश्य ट्यूमर है, जिसका आकार रौसेटा पत्थर से भी बड़ा है. मेरे गर्भ में एक अदृश्य बच्चा है,जिसके पिता को भूलने की बीमारी है. मैं एक अदृश्य उंगली पकड़ कर सदियों से नींद में चल रही हूँ, उस  उंगली के चारों ओर दृश्य बिखरे पड़े हैं.

'बिग बैंग' सिद्धांत से ग्रह जन्मे होंगे. संसार उस  अदृश्य उंगली के चारों ओर घूमता 'सुदर्शन' है.

( दो )

नाचने वाली का मुजरा ही उसका कीर्तन है. अपना कीर्तन भी ईश्वर के सामने मुजरा ही है.

(तीन ) 


अपनी लाल किताब में जीवन लिखते हुए ईश्वर ने पेड़, पहाड़, चाँद -सितारे, चिड़िया, नदिया, झरने ,समन्दर, सब लिख डाला.

.................. और फिर पहली बार मृत्यु शब्द लिखते ही उसने ने अपनी कलम की नोक तोड़ दी !


Thursday, January 5, 2012

शीतयुद्ध

जर्मन फोटोग्राफर नताली बोटर की क्लिक



तुम पेंसिल से लिखते हो
इरेज़र से मिटा देते हो
काग़ज़ फिर सादा हो जाता है
ग़ौर से देखो
सादे काग़ज़ पर भी पेंसिल के दबाव से बने निशान
मेरी हथेलियों की उलझी हुई रेखाओं का मानचित्र हैं
एक-सी है एक बात तुममें और ईश्‍वर में
तुम दोनों का गिरेबान मैंने पकड़ रखा है

*


स्मृतियों की शॉल ओढ़ कर
बचा ली है मैंने पतली नसों में गर्मास
मैं जीवित हूँ
कि तुमने गोली नहीं चलाई है
तुम जीवित हो
कि मैंने नज़र नहीं उठायी है




Saturday, December 31, 2011

सूर्य, पृथ्वी और दो हज़ार ग्यारह गांठें

 पसंदीदा पेंटिंग ( पेंटर नामालूम )


सफ़ेद दाढ़ी वाले तारे
एक जोगन के प्रेम का साक्षी बन
सदियों से जाग रहे हैं
अंतरिक्ष के मंडप में
मन्त्रों का अनुस्वान है

वह स्त्री
पीले चीवर वाले ऋषि के
आलोक से बौरा गयी है
गिन के देखो तो -
उसकी चुनरी के छोर में
दो हज़ार ग्यारह गांठें बंधी हैं

ध्यान में डूबे हुए प्रेमी के
उखम और तेज से गर्भ धारण कर
जनती है / मां बनती है
ऋतु / भोर और जुन्हैया
उसकी गोद में खेलती संतानें हैं

जिसके ललाट पर चमकती सलवटें हैं
वह ऋषि आकाश में धूनी रमाये बैठा है
उसकी अमित आभा से सम्मोहित
प्रेयसी का सूफी नृत्य अनवरत चलता है !

 (2011 को विदा करते हुए.)