Saturday, 12 November 2011

आहो ने भी तो साथ, लबौ का, दीया नहीं,


आहो ने भी तो साथ, लबौ का, दीया नहीं,
मेने ये दिल जलाने को , क्या-क्या किया नहीं,
गिरता रहा ,हरेक अश्क, मेरा जमीन,पर,
बढके किसिने दामन, आगे किया नहीं,
में जी रहा हूँ,बस एक, मौत केही इन्तेज़ार् में
मर्जी से घड़ी-भर तो यहा में जिया नहीं,
एक मौत ही ,खफा है, हमसे ,नहीं तो क्या,
वो कौन सा जहर हे जो, मेने पिया नहीं,
"मुकेश" याद हे, मुजे आज भी, वो शमा
दिल लेके बे-वफाने वापस, किया नहीं,

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